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Monday, August 15, 2016

पत्रकारिता का आईना (चकाचाैंध रोशनी का सच)

हम ‪#‎पत्रकार‬ भी औपचारिक रूप से मजदूर ही हैं। अंतर इतना ही है कि एक ‪#‎मजदूर‬ की दिहाड़ी 300 रूपये से शुरू होती है, जबकि #पत्रकार की 50-100 ‪#‎रुपये‬ से. आज की ‪#‎पत्रकारिता‬ पहले जैसी नही रही। आजादी के पहले पत्रकारिता देशभक्ति थी. उस समय के पत्रकार कलम से लिखते उसकी 10 कॉपियाँ बनायीं जाती और गांव की पंचायत में उसे पढ़ कर सुना दिया जाता था. इससे गांव के सभी लोगों को देश के हालात का पता चल जाता था.

आज यह ‪#‎profession_with_passion‬ है. शुरुआत में ही सिखाया जाता है कि हमे पैसे के पीछे नहीँ पैशन के पीछे भागना है। इसलिए नवोदित पत्रकार फ्री में, 100 रुपये में या फिर अपना पैसा लगाकर भी पत्रकार कहलाना पसंद करते हैं. यह ‪#‎लत‬ ऐसी है कि आप अपने घर-बार माँ-बाप को भूल जाते हैं. कई बार पेट की भूख भी.
मुंबई-दिल्ली जैसे महानगरों में मैंने पत्रकारों को 12-15 रुपये के वडा_पांव और #छोले-कुल्चे भी काम चलाते देखा है, क्योंकि ‪#‎रोटी‬ ‪#‎चावल‬ खाने से उनके ‪#‎घरवाले_भूखे‬ रह जायेंगे. कई तो ऐसे भी पत्रकार हैं जो दो रोटी के लिए अपनी प्रतिभा को भी बेचते हैं. मसलन मीडिया हाउस में ‪#‎चाचा_भतीजावाद‬ और ऊपर के ‪#‎ओह्देवालों‬ का ‪#‎महिला_प्रेम‬ उन्हें संस्थान का नौकर भी नहीँ बनने देता. मजबूरन वे किसी ‪#‎एडिटर_की_प्रेमिका‬ (इंटर्न या ट्रेनी) के लिए कॉपी लिखा करते हैं. उसके बदले या तो एडिटर खुद या ज्यादा मेहरबानी हुई तो ‪#‎प्रेमिका‬ के हाथों दिहाड़ी दिलवा देते हैं. वैसे एडिटर उस  ‪#‎अनौपचारिक_पत्रकार‬ से ‪#‎प्रभावित‬ तो बहुत होते हैं. उसे नौकरी पक्की कराने का ‪#‎प्रलोभन‬ भी देते हैं, पर नौकरी पर इसलिए नहीँ रखते कि औपचारिक पत्रकार होते ही कही वह उनके गर्लफ्रेंड की नौकरी न खा जाये. अख़बारों में यह प्रचलन विगत कुछ दिनों में बढ़ा है, पर चैनलों में इसके उदाहरण आसानी से और हर छोटे-बड़े मीडिया हाउस में मिल जायेंगे.
अब अगर ‪#‎औपचारिक_पत्रकारिता‬ की बागडोर संभलनेवाले पत्रकारों की बात करें, तो एक तरफ जहाँ किसी भी प्राइवेट फर्म में 300 रुपये से न्यूनतम दिहाड़ी शुरू होती है, वहीँ मीडिया में 100 रुपये में भी आपको अच्छे टिकाऊ पत्रकार मिल जायेंगे. न उनमें पत्रकारिता की क्षमता कम होगी, न ‪#‎जोश_ओ_जूनून‬ में. फर्क इतना ही होगा कि उसका हाथ पकड़नेवाला कोई चाचा-भैया उस मीडिया हाउस या किसी अन्य में मीडिया हाउस में नहीं होगा...

#‎मजीठिया_वेज_बोर्ड‬ की सिफारिश

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जब ‪#‎मजीठिया_वेज_बोर्ड‬ की सिफारिश के अनुसार पत्रकारों को सैलरी देने की बारी आयी, तो एडिटर ने अपने हाथ से सभी पत्रकारों से उस फॉर्म पर sign करने सॉरी... अंगूठा लगाने को कहा जिसमे लिखा था "..... हमेँ किसी वेज बोर्ड की सैलरी से मतलब नहीं. हम इसी सैलरी में खुश हैं." सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि उन कागजों को नहीं माना और स्तरीय सैलरी देने का आदेश दिया, पर देश के इस चौथे स्तंभ की जड़ें इतनी खोखली हो गयी हैं कि अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी उस पर फर्क नहीं पड़ता. कुछ एक पत्रकार यदि कंप्लेन करने जाते भी हैं, तो उन्हें अपनों की ही गाली खानी पड़ती है..ऊपर से नौकरी बचा पाना मुश्किल हो जाता है.. अंत में वे या तो कंप्रोमाइज करने को या फिर दूसरे सेक्टर में नौकरी करने को विवश हो जाते हैं.

पत्रकारिता या मुखपत्र

आजकल पत्रकारिता बीजेपी, कांग्रेस, लेफ्ट और राज्यस्तरीय पार्टियों का ‪#‎मुखपत्र‬ बनकर रह गयी है. आपने ‪#‎media_cultivation_theory‬ शायद पढ़ी हो. इस थ्योरी का मतलब जो मीडिया दिखायेगा वही आम जनता देखेगी/पढ़ायेगा वही पढ़ेगी. ऐसे में इन मुखपत्रों से जनता का भला हो जाये यह कह पाना उतना ही मुश्किल है, जितना कसाई से बकरे का देखभाल करवाना. हर पार्टी और उनके नेताओं की अघोषित कमाई के हिस्से से ही ज्यादातर मीडिया हाउस खुलते हैं...जैसे ही काला धन सफेद हो जाता है...नेता या पार्टी अपना हाथ उस मीडिया हाउस से खींच लेते हैं और फिर पत्रकार सड़कों की ठोकर खाने को या..चाटूकारिता करने को तैयार हो जाता है.